धर्म का सही अर्थ
धर्म शब्द की उत्पत्ति ‘धृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ धारण करना है। इस संसार में जो भी गुण मनुष्य के लिए धारण करने योग्य है, उसे धर्म कहा जा सकता है। इस परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि हर पदार्थ का जो मौलिक गुण है वह उसमें निहित धर्म है। जैसे पानी का धर्म प्यास बुझाना है। अगर उसे उबाल देंगे तो वह वाष्प बन जाएगा, पर ठंडा होकर फिर प्यास बुझाएगा। वही पानी जमकर बर्फ बन जाएगा और पिघलकर फिर प्यास बुझाएगा। किसी भी स्थिति में पानी अपना मौलिक गुण, अपना धर्म नहीं छोड़ता है। प्रत्येक पदार्थ में निहित वह विशेष गुण जो उसे उपयोगी बनाता है, उसका धर्म है। अर्थात धर्म और कर्म में कोई अंतर नहीं है। प्रत्येक परिस्थिति में धर्म के अनुसार आचरण करना हमारे जीवन का कर्म है और जब हम ऐसा कर्म करते हैं हम स्वयं ही सुखों को आमंत्रित कर लेते हैं।
इस सत्य को स्वीकार करते हुए चाणक्य कहते हैं कि सभी सुखों के मूल में धर्म कार्य कर रहा है। भोजन, निद्रा, भय पशु में भी पाए जाते हैं। वहीं धर्म ही मनुष्य को पशु से अलग करता है। यहां पर विचार करने योग्य तथ्य यह है कि सिर्फ मनुष्य है जो अपने जीवन को बड़ा बनाना चाहता है। जिसके मन में कामनाएं उत्पन्न होती हैं, भविष्य को सुरक्षित करने की इच्छा होती है और जो अपने कल को बेहतर करने के लिए आज कर्मशील होने के लिए तत्पर है। पशुओं को कल की चिंता नहीं होती। यानी धर्म वह प्रयोजन है जिसके द्वारा जीवन को महानता की ओर ले जाया जा सकता है।
धर्म का आचरण करने से ही मनुष्य के जीवन में अर्थ और काम की उपलब्धि होती है। फिर धर्म को छोड़कर किसी और की शरण में आप कैसे जा सकते हैं? शास्त्र सहर्ष स्वीकार करते हैं कि जिससे जीवन में श्री, अभ्युदय अर्थात उन्नति और सिद्धि प्राप्त हो, वह धर्म है। फिर इसमें कोई दो राय किस तरह से हो सकती है कि धर्म का अर्थ ही उत्तम प्रकार के कर्म करना है, जिसके द्वारा कामनाओं को पूर्ण किया जा सके। सीधे शब्दों में कहें तो कामनाओं को पूरा करने के लिए कमाना पड़ता है और कमाई में जब कमी होती है तो जीवन दीन-हीन हो जाता है। धर्म की हानि उस समय होती है जब हम बिना कर्म किए छल से, बल से, कामनाओं को पूरा करना चाहते हैं लेकिन उससे भी अधिक धर्म की हानि तब होती है। जब हम शोषण का प्रपंच शांत भाव से देखते हैं। उस समय यह याद रखें कि आप भी भीष्म की भांति अपने कर्म से हट रहे हैं।
इस जीवन में धर्मज्ञ बनना है, धर्मभीरु नहीं। किसी भी वस्तु, व्यक्ति अथवा विषय से भय उस समय तक ही रहता है, जब तक हमें उस विषय का पूर्ण ज्ञान न हो जाए। धर्म का वास्तविक अर्थ यथोचित कर्म करना है जो जीवन को उन्नति की ओर ले जाए। इस प्रवाह में बहने का नाम ही धार्मिकता है।
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