हरी खाद - मिट्टी की खोई उर्वरता बढ़ाने का प्राकृतिक समाधान
रायपुर : हरी खाद - मिट्टी की खोई उर्वरता बढ़ाने का प्राकृतिक समाधानमिट्टी की घटती उर्वरता और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता को लेकर कृषि विभाग गंभीर दिखाई दे रहा है। जिसके बेहतर व समाधान के रूप में विभाग द्वारा सूरजपुर जिले के किसानों से, हरी खाद अपनाने का आह्वान किया है।
कृषि विभाग ने स्पष्ट किया है कि बढ़ती जनसंख्या और घटते जोत के कारण किसान एक ही भूमि पर सघन खेती करने को विवश हैं। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन एवं पोषक तत्वों की तेजी से गिरावट आ रही है। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग और पशुधन में कमी के चलते गोबर खाद की उपलब्धता भी घटती जा रही है। ऐसी विषम परिस्थिति में मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने का सबसे सरल, सस्ता और टिकाऊ उपाय हरी खाद ही है। कृषि विभाग ने किसानों को हरी खाद अपनाने की सलाह देते हुए कहा कि यह न केवल मिट्टी को पुनर्जीवित करने का सबसे सस्ता उपाय है, बल्कि टिकाऊ खेती की दिशा में एक निर्णायक कदम भी है।
क्या है हरी खाद:-
हरी खाद (ग्रीन मेन्युर) उन फसलों को कहते हैं जिन्हें विशेष रूप से उगाकर हरी अवस्था में ही खेत में जुताई करके मिट्टी में मिला दिया जाता है। ये मुख्यतः दलहनी फसलें होती हैं जिनकी जड़ों में पाया जाने वाला राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करता है - वही काम जो किसान अब तक महंगे यूरिया से कराता आया है। हरी खाद की प्रमुख फसलों में ढैंचा, सन, मूंग, उड़द, लोबिया, चरोटा, ग्वारफली एवं बरसीम शामिल हैं।
अनेक समस्याओं का एक समाधान
हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण होता है, फॉस्फोरस की घुलनशीलता बढ़ती है और जिंक, आयरन, कॉपर, मैग्नीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी सुलभ हो जाते हैं। मिट्टी की भौतिक संरचना सुधरती है, वह नरम और भुरभुरी बनती है तथा जल धारण क्षमता बढ़ने से सूखे में भी फसल को राहत मिलती है। इसके साथ ही खरपतवारों का प्राकृतिक नियंत्रण होता है, लाभकारी मृदा जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है और आगामी फसल में कीट व रोग का प्रकोप घटता है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि रासायनिक खाद की जरूरत कम होने से किसान की उर्वरक लागत में उल्लेखनीय कमी आती है और आय में वृद्धि होती है।
ढैंचा - तीन बोरी यूरिया के बराबर
जिला सूरजपुर के सहायक मृदा परीक्षण अधिकारी ने किसानों को हरी खाद के संबंध मे जानकारी देते हुए बताया कि ढैंचा सर्वाधिक प्रभावी हरी खाद फसल है जो प्रति एकड़ 55 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करती है, जो लगभग 120 से 130 किलोग्राम यूरिया यानी करीब तीन बोरी के बराबर है। सन से 45 से 50 किलोग्राम, बरसीम से 48 से 50 किलोग्राम तथा लोबिया एवं ग्वारफली से 22 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति एकड़ प्राप्त होती है।
सही समय पर करें बुवाई
कृषि विभाग द्वारा किसानों को सलाह दी है कि खरीफ सीजन में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने पर मई माह में छिड़काव विधि से बुवाई करें। असिंचित क्षेत्रों में वर्षा से पूर्व जून माह में बुवाई करें और जब फसल 40 से 50 दिन की हो जाए, तब उसे हरी अवस्था में ही जुताई करके मिट्टी में मिला दें। रबी सीजन के लिए बरसीम एवं रिजका की बुवाई अक्टूबर-नवम्बर में करें और बुवाई से 50 से 60 दिन बाद खेत में पलटें।
कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे इस खरीफ सीजन से ही हरी खाद को अपनी खेती का अनिवार्य हिस्सा बनाएं। रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती लागत और घटती मृदा उर्वरता के इस दौर में हरी खाद न केवल किसान की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उपजाऊ भूमि भी सुरक्षित रखेगी। अधिक जानकारी के लिए किसान जिला कृषि कार्यालय एवं मृदा परीक्षण कार्यालय सूरजपुर से संपर्क कर सकते हैं।
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