फरिश्ता बनी पुलिस, टीआई ने बचाई पत्रकार की जान
सागर। सोमवार शाम सागर के मकरोनिया थाने में जो हुआ, उसने खाकी के मानवीय चेहरे की एक ऐसी मिसाल पेश की जिसे बरसों तक याद रखा जाएगा। एक तरफ मौत दस्तक दे रही थी और दूसरी तरफ टीआई रावेंद्र सिंह चौहान अपनी पूरी ताकत से एक जिंदगी को वापस खींचने की जद्दोजहद कर रहे थे।
नब्ज डूबी थी, लेकिन उम्मीद कायम थी
मकरोनिया निवासी फोटो जर्नलिस्ट जितेंद्र श्रीवास (42) अपने साथी के साथ सामान्य मेल-मुलाकात के लिए थाने पहुंचे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले ही पल क्या होने वाला है। थाने के भीतर पानी पीने गए जितेंद्र अचानक बेसुध होकर गिर पड़े। जब साथी अर्पित और टीआई चौहान कमरे में पहुंचे, तो नजारा खौफनाक था—जितेंद्र के मुंह से झाग निकल रहा था और प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो उनकी नाड़ी लगभग डूब चुकी थी।
5 मिनट का वह संघर्ष और फिर लौटी सांसें
संकट के उन चंद पलों में टीआई रावेंद्र सिंह चौहान ने बिना वक्त गंवाए मोर्चा संभाला। चिकित्सा विज्ञान में 'गोल्डन ऑवर' की अहमियत को समझते हुए उन्होंने तत्काल जितेंद्र को सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) देना शुरू किया। लगभग 5 मिनट तक वे लगातार जितेंद्र के सीने को पंप करते रहे। यह पुलिस अधिकारी की जीवटता ही थी कि डूबती हुई सांसें एक जोरदार झटके के साथ वापस लौट आईं। वह मंजर किसी चमत्कार से कम नहीं था जब मौत को मात देकर जितेंद्र ने अर्ध-बेहोशी में आंखें खोलीं।
अस्पताल में संघर्ष जारी

हालत की गंभीरता को देखते हुए पुलिसकर्मी अपनी निजी कार से उन्हें पहले सामुदायिक केंद्र और फिर डॉ. राय अस्पताल ले गए। फिलहाल जितेंद्र वेंटिलेटर पर हैं और उनकी स्थिति नाजुक बनी हुई है। डॉक्टरों के अनुसार, उनका बीपी अत्यधिक गिरना चिंता का विषय है, लेकिन समय पर मिले सीपीआर ने उनके बचने की संभावनाओं को जीवित रखा है।
पत्रकार संगठनों ने मुक्तकंठ से सराहा
टीआई चौहान के इस मानवीय प्रयास व संवेदना की बुंदेलखंड प्रेस क्लब और संभागीय प्रेस क्लब ने मुक्तकंठ से सराहना की है। पत्रकारों का कहना है कि अगर उस वक्त टीआई ने तत्परता न दिखाई होती, तो आज कहानी कुछ और होती। पुलिस की इस तत्परता ने आज न केवल एक पत्रकार की जान बचाई, बल्कि समाज का खाकी पर भरोसा और गहरा कर दिया।
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