अंबाला में स्थित माता झावरियां मंदिर का पाकिस्तान से है गहरा नाता, विभाजन की कहानी आज भी ज़िंदा
हर मंदिर की एक कहानी होती है, लेकिन अंबाला के रामपुरा मोहल्ला में स्थित झावरियां वाली माता के मंदिर की कथा बेहद खास और भावनाओं से भरी हुई है. यह सिर्फ एक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि देश के बंटवारे के दर्द और उस दौर की आस्था का जीवित प्रमाण भी है.
करीब 75 साल पहले, जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ, तब लाखों लोग अपनी ज़मीन और पहचान छोड़कर हिंदुस्तान आए. इन्हीं में से एक थे बाबा फुलू, जिन्हें पाकिस्तान के झावरियां गांव में कुएं की खुदाई करते समय माता ने कन्या रूप में दर्शन दिए थे. कहा जाता है कि उस वक्त धरती से खून की धारा बहने लगी थी और सब हैरान रह गए थे. उसी स्थान पर एक भव्य मंदिर बना, लेकिन बंटवारे के बाद जब बाबा फुलू भारत आए तो माता की प्रतिमा को साथ लाना नहीं भूले.
अंबाला बना नया धाम
बाबा फुलू ने अंबाला के रामपुरा मोहल्ले में माता की स्थापना की और तभी से यह मंदिर झावरियां वाली माता के नाम से प्रसिद्ध हो गया. भक्त आज भी मानते हैं कि इस मंदिर में जो भी सच्चे मन से मां के दरबार में आता है, उसकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं.
मंदिर के पुजारी रमेश चंद, जो बाबा फुलू जी के वंशज हैं, बताते हैं कि “यह मंदिर सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि श्रद्धा और बलिदान की मिसाल है.”
आज भी माता करती हैं चमत्कार
यहां हर दिन सैकड़ों श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं और नवरात्र जैसे पर्वों पर यह संख्या हज़ारों तक पहुंच जाती है. भक्तजन इस मंदिर को ‘पाकिस्तान वाली माता’ भी कहते हैं, और यहां की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूजा-पाठ की परंपराएं आज भी बाबा फुलू के परिवार द्वारा निभाई जाती हैं.
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